Wednesday, February 4, 2009

संसदीय राजनीति जीने नहीं देगी और लोकतंत्र मरने नहीं देगा

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का तमगा लगाकर जीना आसान काम नहीं है। खासकर लोकतंत्र अगर संसदीय राजनीति की मोहताज हो और संसदीय राजनीति की सत्ता समूचे देश को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाये। लोकतंत्र का मतलब है-हर नागरिक को बराबर अधिकार और सत्ता में भागेदारी के लिये बराबर के अवसर। लोकतंत्र बरकरार रहे, यह देश की संसद और राज्यों की विधानसभा के सदस्यों के कंधों पर सबसे ज्यादा है। जनता अपने जितने नुमाइन्दों को चुनकर संसद और विदानसभा में भेजती है, इनकी संख्या देश की समूची जनसंख्या का दशमलव शून्य शून्य शून्य एक फिसदी से भी कम है।
लेकिन इस राजनीतिक लोकतंत्र का विस्तार पंचायत, गांव और जिला स्तर पर चुने जाने वाले करीब अड़तीस लाख सदस्यों तक भी है । संयोग से यह भी देश की जनसंख्या का एक फीसदी नहीं है। लेकिन लोकतंत्र के तमगे का खेल यहीं से शुरु होता है। चुने हुये नुमाइन्दे के घेरे में पहुंचते ही ऐसे विशेषाधिकार मिलते हैं, जो कानून और सुविधा का दायरा एकदम अलग बना देते हैं। इस दायरे में जो एक बार पहुंच गया वह कैसे इस दायरे से अलग हो सकता है। इसलिये कहा भी जाता है कि डाक्टर-इंजीनियर-उघोगपति से लेकर बेरोजगार-अशिक्षित-दलित-पिछड़ा हर कोई राजनेता बन सकता है, लेकिन जो इस राजनीति के घेरे में एकबार आ गया वह कुछ और नहीं कर सकता।

जाहिर है लोकतंत्र का पहला पाठ यहीं से शुरु होता है, जिसमें विरासत के जरीये पीढि़यों को सहजने और घर की चारदीवारी में सुरक्षा-सुविधा का ऐसा ताना बाना बुना जाता है जो इस एहसास को खत्म करता है कि सत्ता का मतलब देश और सौ करोड़ लोग हैं। लोकसभा के 545 सदस्यों में से मौजूदा वक्त में पन्द्रह फीसदी सदस्य यानी करीब 80 सदस्य ऐसे हैं, जिनकी पहचान किसी बड़े नेता के बेटे-बेटी या पत्नी-बहू के तौर पर है। संबंधों की फेरहीस्त में संयोग से उन्हीं नेताओं के परिवार के सदस्य अगली कतार में हैं, जिन्होने वाकई सड़क से संसद का रास्ता तय किया। जिन्होंने गांव-खेडे की पगड्डिया समझीं। जिन्होंने देश के मर्म को अपनी धमनियों में दौड़ते देखा।

इन नेताओं में से कुछ नेताओं के बच्चे जब बाप की राजनीति के भरोसे सत्ता के दायरे में आ गये तो समझ पैदा हुई लेकिन कईयों ने उस राजनीति को थामा, जिसमें अपना पेट -अपनी जेब के अलावा कुछ समझना मुश्किल हो । अपने अपने घेरे में लोकतंत्र की इस राजशाही का नमूना देखे- गांधी-नेहरु परिवार की नयी पीढी राहुल गांधी, कश्मीर में अब्दु्ल्ला परिवार की नयी विरासत उमर अबदुल्ला । अकाली दल में बादल परिवार के सुखबीर बादल, समाजवादी नेता मुलायम के पुत्र अखिलेश यादव, मराठा नेता शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले । द्रमुक नेता करुणानिधि का बेटा स्टालिन और बेटी कोनीमाझी, हिन्दुओं की सरमायेदार होने का ऐलान करने वाली बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह । जनसंघ के जमाने से साईकिल और पैदल लोगों के बीच राजनीति करते हुये देश को अयोध्या की घुट्टी पिलाने वाले कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह । जेपी आंदोलन से निकले लालू यादव की पत्नी राबडी देवी । बाबू जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार, हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी रीता बहुगुणा। जसवंत सिंह, मुरली देवडा, पायलट,सिधिया, हुड्डा,शीला दीक्षित सरीखे बडे नेताओं की लंबी फेरहिस्त है जो अपने बच्चों के लिये सत्ता का रास्ता साफ करती हैं।

बाला साहेब ठाकरे के राजनीतिक प्रयोग राजशाही अंदाज के विकल्प के तौर पर उभरे लेकिन लोकतंत्र के संसदीय मिजाज ने उन्हें भी अपनी राजनीतिक विरासत बेटे उद्दभ ठाकरे के ही नाम करनी पड़ी। लोकतंत्र की यह समझ पंचायत स्तर तक पहुंचते पहुंचते कैसे एक वर्ग में तब्दील हो जाती है इसका एहसास इसी से हो सकता है कि पिछले दो दशक में गांव-पंचायत-जिले स्तर पर नुमाइन्दे चुने गये उसमें करीब बीस लाख परिवार ऐसे हैं, जिनकी विरासत ही राजनीति को थामे हुये है।

दरअसल, तीन स्तरीय संसदीय राजनीति में पंचायत स्तर पर अड़तीस लाख सात सौ के करीब नुमाइन्दे चुने जाते हैं । उपरी तौर पर संसदीय लोकतंत्र की यह समझ सही लग सकती है जिसमें चुनाव लड़ने का रास्ता हर किसी के लिये खुला होता है तो किसी नेता बाप का बेटा भी अगर चुनाव मैदन में हो तो वोट तो जनता को देना होता है । लेकिन संसद या विधानसभा का रास्ता इतना आसान है नहीं, जितना लगता है । राजनीति का महामृत्युंजय जाप सत्ता तक कैसे पहुंचाता है और इसके पीछे की बिसात देश की समूचे शाही तंत्र में किस तरह लोकतंत्र का मुलम्मा चढ़ा कर अपने आप को बचाती है, जरुरी है यह समझना।

किसी राजनीतिक दल से चुनावी टिकट की चाहत किसी को भी इसलिये लुभाती है क्योकि राजनीतिक दल के पास संगठन होता है य़ानी इतने लोग होते है जो वोटिग के दिन पोलिंग बूथ पर मौजूद रह कर हर जरुरी काम निपटा सकता है। और लोकसभा चुनाव में हर सीट पर कम से कम चार से पांच हजार का कैडर उम्मीदवार के पास होना ही चाहिये। कैडर इसलिये क्योंकि चुनाव के दिन इन चार से पांच हजार लोगों के सामने दूसरे राजनीतिक दल से सौदेबाजी करने का सबसे ज्यादा मौका होता है। इसलिये प्रतिबद्ध लोग चाहिये ही। किसी भी युवा को आज की तारीख में राजनीति में आने के लिये इस तरह प्रतिबद्द लोगों की फेरहिस्त बनाने में कम से कम दस साल जरुर लगेंगे। यानी जबतक दो आपसी विरोधियों को जनता बारी बारी से चुने और फिर एक ही थैले के चट्टे बट्टे के तौर पर ना देखे। लेकिन समाधान इससे भी नही होता। अब के दौर में पूंजी और मुनाफे के भरोसे सत्ता-राजनीति ने जिस तरह जनता से पल्ला झाडा है उसमें हर चुनावी क्षेत्र में पार्टियों के उम्मीदवार के ऐलान के साथ ही व्यापारी-उघोगपति-दलालपतियों की पोटलिया चुनावी मदद के नाम पर खुल जाती हैं। इसलिये राजनीतिक दल भी अब चुनाव की तारीख के ऐलान से पहले ही उम्मीदवार का ऐलान कर देते हैं, जिससे धन जुगाड़ने में कोई परेशानी ना हो और कौन कौन उनकी पार्टी और उम्मीदवार के नाम पर पोटली खोल सकता है, यह साफ होने लगे।

फिर राजनीतिक दल उन्हीं सौदेबाजों के लिये नीतियां गढने और सत्ता की लकीर बनाने में जुटते हैं। चुनावी फंड का व्यापारी-उघोगपति-दलालपतियों से आना और उसे आम वोटरों में लुटने का खेल चुनावी साइकिल की तरह चलता है। जिसे आज की तारीख में देखे तो यह अभी से शुरु हो चुका है। इसमें सत्ताधारियों के उम्मीदवारों को लाभ भी मिलने लगता हैं क्योकि चुनाव की तारीख के ऐलान के बाद से चुनाव आचार संहिता लागू होती है तो उससे पहले ही जीत का चक्रव्यू का सत्ता द्वारा बनाने का खेल चलने लगता है । अगर जनता की भावना सत्ताधारी के खिलाफ तो विपक्षी दल के उम्मीदवार के वारे न्यारे होने लगते हैं। क्योकि राजनीति के उगते सूरज को पूंजी की पोटली से सलाम करने वालो की होड़ लगती है। चूंकि सत्ता संम्भालते वक्त राज्य के लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पाठ यही होता है कि किसी भी तरह उसकी सत्ता बरकरार रहे। और सत्ता पाने का तरीका पूंजी और मुनाफे की थ्योरी की गलियों से होकर निकलता है, तो समूची कवायद उसी को लेकर होती है।

असल में लोकतंत्र की जागरुकता मुनाफे के इर्द-गिर्द किस तरह जा टिकी है, यह बाजार के मुनाफे की समझ और जातियों की राजनीतिक जागरुकता से भी उभरा है। मान जाता था पहले गांव के लोगों में राजनीतिक जागरुकता नहीं थी तो वह अपना वोट बेच देते थे। लेकिन आधुनिक दौर में वोट नही सरकार और सत्ता बिकती है । देश में कौन सी नीति किस औघोगिक घराने को लाभ पहुंचा सकती है, शुरुआती समझ यही से बढ़ी। लेकिन लोकतंत्र में हर किसी की बराबरी की भागेदारी ने हर तबके-जाति में अब उस सौदेबाजी के लंबे मुनाफे के तंत्र को विकसित कर दिया, जिसमें मामला सिर्फ एक बार वोट बेचने से नही चलता बल्कि पांच साल तक सत्ता को दुहने का खेल चलता रहता है। यानी चुनावी लोकतंत्र का मतलब चंद लोगो के लिये नीतियों के जरीये मुनाफे का ब्लैंक चैक है तो एक बडे वोट बैंक के लिये पांच साल तक का रोजगार है।

यानी राजनीतिक चुनाव का एक ऐसा तंत्र समाज के मिजाज में ही बना दिया गया है, जिसमें बिछी बिसात पर पांसे तो कोई भी फैंक सकता है लेकिन पांसा उसी का चलता है जिसके हाथ से ज्यादा आस्तीन में पांसे हो। लोकतंत्र के इस चुनावी खेल में सहमति-असहमति मायने नहीं रखती। हर स्तम्भ के लिये खुद को सत्ता की तर्ज पर बनाये और टिकाये रखते हुये अपनी जरुरत बताने का खेल सबसे ज्यादा होता है। आर्थिक नीतियों के फेल होने से लेकर देश की सुरक्षा में लगातार सेंध लगने पर आम जनता के निशाने पर राज्य और राजनीति आयी तो उसे बचाने के लिये न्यायपालिका और मीडिया ही सक्रिय हुआ। कड़े कानून के जरीये काम ना करने की मानसिकता का ढाप लिया गया । शहीदों के परिवारों को नेताओं के हाथों सम्मान दिलवाने के कार्यक्रम के जरीये जनता के आक्रोष को थामने का काम मीडिया ने ही किया। इसको सफल बनाने में औघोगिक घरानों ने कोई कसर नहीं छोडी । विज्ञापन और प्रयोजक खूब नजर आये । आर्थिक नीतियों तले करीब एक करोड़ लोगों के रोजगार जा चुके हैं, लेकिन विधायिका और कार्यपालिका ने न्यायपालिका का आसरा लेकर बेलआउट की व्यूहरचना कुछ इस तरह की, जिससे बाजार व्यवस्था चाहे ढह रही हो लेकिन कमजोर ना दिखे । इसी के प्रयास में कम होते मुनाफे को घाटा और घाटे को बेलआउट में बदलने की थ्योरी परोसी जा रही है।

लेकिन जहां दो जून की रोटी रोजगार छिनने से जा जुड़ी है, उसे विश्वव्यापी मंदी से जोड़कर आंख फेरने की राज्यनीति भी बखूबी चल रही है । इसलिये कोई एक स्तम्भ अगर जनता के निशाने पर आता है तो बाकी सक्रिय होकर उसे बचाते है, जिससे लोतकंत्र का खेल चलता रहे । इन परिस्थितियों में विकल्प का सवाल महज सवाल बनकर ही क्यों रहेगा, इसका जबाब इसी गोरखधंधे में छिपा है कि सभी के लिये एक बराबर खेलने का मैदान नहीं है। लोकतंत्र हर किसी के बराबरी का नारा तो लगाता है लेकिन गैरबराबरी का अनूठा चक्रव्यूह बनाकर। चक्रव्यू का मतलब लोकतंत्र के संसदीय विकल्प को खारिज करते हुये हर किसी को संसदीय राजनीति के घेरे में लाकर हमाम में खड़ा बतलाना से कहीं ज्यादा है । इसीलिये ओबामा के जरीये सपना जगाने की राजनीति तो लोकतंत्र कर सकता है लेकिन कोई ओबामा इस चक्रव्यू को तोड़ पाये इसकी इजाजत संसदीय राजनीति नहीं देती। इसीलिये ओबामा का मतलब या उसको परिभाषित करने का मंत्र महज युवा होने पर आ टिकता है। जो नेताओ की विरासत में राहुल-प्रियंका से लेकर मोदी-मायावती पर ही जा टिकता है। यह राजनीति भूल जाती है कि राष्ट्रपति बनने से पहले तक ओबामा अपनी पढाई के लिये लिये गये कर्ज तक को नहीं चुका पाया था । जो जीने की जद्दोजहद में ही घर-परिवार-समाज-देश हर त्रासदी से रुबरु हो रहा था। और जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के लोगों पर संकट गहराया तो उन्हे ओबामा के संघर्ष में अपनी जीत नजर आयी।

लेकिन भारत की संसदीय राजनीति तो अभी भी दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र होने का तमगा छाती में लगाये हुये है इसलिये हर विकल्प का संघर्ष उस संसदीय राजनीति के खिलाफ जायेगा जिसकी चादर में लोकतंत्र को लपेट कर सत्ता बरकरार रखी जा रही है।

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