Sunday, September 7, 2008

कश्मीर पर क्या यह हिन्दुत्व का डंका है !

दर्जनों सवाल इस तरह उठे, जैसे हम कश्मीर के हिमायती हैं और देश की नहीं सोच रहे हैं। और आप सभी में ज्यादातर को देश का दर्द है। चलिए, अब बतौर राष्ट्रवादी होकर ही ज़मीन पर हुए समझौते का जवाब दे दीजिए।

बंधु...
जम्मू में खुशी है समझौता हो गया है । अस्थायी ही सही 40 एकड़ जमीन श्राईन बोर्ड को दे दी जायेगी, जब अमरनाथ यात्रा शुरु होगी । रंग-अबीर-गुलाल हवा में उड़ाये गए । दो महिने का संघर्ष रंग लाया । लेकिन यह खुशी किसकी है...कौन खुश हो रहा है । क्या वाकई वह हिन्दु खुश है जो सवाल खड़ा कर रहा था कि देश भर में जब मस्जिद-मकबरों को जमीन दी जा सकती है तो बाबा भोले के लिये 800 कनाल ज़मीन क्यों नहीं दी जा सकती है। क्या कश्मीरी पंडित खुश हैं जो दो दशकों के अपने दर्द को भोलेनाथ के नाम पर दी जाने वाली जमीन के आंदोलन के आसरे पहली बार सड़क पर कश्मीरी मुसलमानों के खिलाफ नारे लगा रहा था, जो जमीन दी गयी वह तो निर्धारित जमीन से आधी भी नहीं है।
और 800 कनाल ज़मीन देने पर पर राज्य सरकार की कैबिनेट ने मुहर लगायी थी। वो लागू भी हो गया था । बवाल सिर्फ दो वजहों से हुआ था । पहला, जो जमीन दी गयी थी उस पर स्थायी स्ट्रक्चर बनाया जा रहा था। दूसरा, सरकार को समर्थन दे रही पीडीपी समझ चुकी थी कि कांग्रेस सरकार की अगुवाई में चुनाव हुए तो वह निपट जायेगी । सौदेबाजी के तहत तीन साल की सत्ता पीडीपी भोग चुकी थी । अब जनता के सामने चुनाव में वह किस मुंह से जाती, यह सवाल उसे अंदर से खाए जा रहा था।

अपनी ही सहमति को उसने झटके में कश्मीर की अस्मिता का मुद्दा बना कर सरकार गिरा दी। दिल्ली में ऐसी राजनीति खूब खेली जाती रही है । हां, तो मामला है कि देश तो नब्बे करोड़ हिन्दुओं का है तो फिर 800 कनाल जमीन को लेकर सौदेबाजी की जरुरत क्यों आ गयी । और जो समझौता हुआ वह तो देश के हिन्दुओं के लिये नाक कटाने जैसा है। फिर 40 एकड़ पर सहमति क्यों बना ली गयी । और अगर प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी की माने तो लड़ाई तो राष्ट्रवाद और अलगाववाद में है । अडवाणी जी के मुताबिक प्रधामनंत्री मनमोहन सिंह भी इस बात से सहमत है कि वाकई राष्ट्रवाद के खिलाफ अलगाववाद सामने खड़ा है । अगर सहमति देश की है तो फिर समझौते की जरुरत क्या है।

मुझे नहीं लगता इस समझौते से कोइ हिन्दू खुश है । कोई कश्मीरी पंडित खुश है । बात तो आर-पार की होनी थी फिर समझौता किसने कर लिया। जम्मू में दो महिने के आंदोलन में व्यापारियो को सौ करोड़ से ज्यादा का चुना लगा गया । जम्मू में जो व्यापारी हैं, और कश्मीर में जो बिचौलिये व्यापारी है, उनमे सिखों की तादाद भी खासी है । सिख समुदाय का दबाब पंजाब सरकार पर भी काम कर रहा था कि समझौता जल्द कराये । अन्यथा उनका व्यापार ठप होता जा रहा है। पंजाब में अकाली सरकार का भाजपा से समझौता है । भाजपा जिस तेवर के साथ आरएसएस कैडर के साथ खड़े होने की कोशिश जम्मू में कर रही थी, वही भाजपा की राजनीति और उसका व्यापार उसे चेता रहा था कि एक हद से आगे आंदोलन ले जाने की गलती वह न करे। भाजपा को चुनाव बाद सत्ता दिखायी दे रही है । भाजपा सत्ता में रहती है तो आरएसएस की महत्ता देश में कैसी बढ़ती है, यह वाजपेयी सरकार के दौर में समूचे देश ने महसूस किया। आरएसएस भी अपनी पुरानी थ्योरी जम्मू-कश्मीर-लद्दाख को अलग अलग राज्य बनाने के मुद्दे पर खामोश रही। यानी अमरनाथ की यात्रा में हर बरस शामिल होने वाले लाखों भक्तों की भावनाओं को भी समझौते में दफ्न कर दिया गया । सवाल यही से खड़ा होता है कि जिस जमीन की राजनीति की शुरुआत कश्मीर की राजनीतिक जरुरत से शुरु हुई उसका पटाक्षेप जम्मू की राजनीतिक जरुरत से हो गया। कश्मीर में आजादी ने नारे ने जम्मू को भड़काया और जम्मू के बंद व्यापार ने कश्मीर को भड़काया। जम्मू से कश्मीर जाने वाले हर रास्ते को बंद कर घाटी को देश से अलग-थलग कर यह बताने का प्रयास भी हुआ कि जम्मू के बगैर कश्मीर जन्नत रह नहीं सकती और कश्मीर ने आजादी का नारा लगा कर इस एहसास को भी उभार दिया कि उन हालातों में रास्ता जम्मू के बदले मुज्जफराबाद जाता है।

संयोग से सत्ता के मुनाफे पर टिकी राजनीति को भी अब बाजार के मुनाफे में ज्यादा उम्दा राजनीति दिखायी देने लगी है । इसी वजह से आर-पार के राष्ट्रवादी आंदोलन को खारिज कर सौदेबाजी की राजनीति को अपनाया गया। 40 एकड़ जमीन का समझौता उस राजनीति का सच है, जिसमे समाज को बांट कर सुधार के उपाय वही संसदीय राजनीति अपनी जेब में रखना चाहती है जो अमरनाथ के जरीये राष्ट्रवाद को उभारती है...जो आजादी के नारे में अलगाववाद का उभरना देखती है।
अब आप इस सवाल को उठा सकते है कि समझौता हुआ तो शांति तो हुई। क्या समझौता न करके हालात बद से बदतर होने दिये जाते । यकीकन यह संभव नही है । लेकिन अगर आपको लगता है कि कश्मीरियों को पाठ पढ़ाना चाहिये...अगर आपको लगता है कश्मीर के लोग आंतकवादियों को पनाह देते है ..अगर लगता है कि कश्मीरियो का दिल पाकिस्तान में है ...अगर लगता है कि महबूबा मुप्ती सरीखी नेता देश की नहीं पाकिस्तानियों-आंतकवादियों की हिमायती है..तो फिर 40 एकड जमीन का संमझौता क्यों । यह कैसे संभव है कि कश्मीर को लेकर हम एकबार पाकिस्तान का राग आलापे और दूसरी बार समझौते करके जीत का जश्न मना लें।

यकीन जानिये अमरनाथ यात्रा की जमीन को लेकर किसी दल-संगठन की भावना हिचकोले नही मार रही थी और आप जो उसमे हिन्दुस्तान का बिगड़ता नक्शा देख रहे हैं, उन्हे समझना होगा कि धर्म और राज्य एक साथ नही चल सकते। इतिहास टटोलिये भारत का नक्शा सबसे बड़ा-मजबूत कब था । मुगल काल में औरगंजेब और मौर्य काल में अशोक के दौर में । इन दोनो कालों में इनसे बड़ा शासक कोई दूसरा नही था । लेकिन दोनो का पतन तभी हुआ जब दोनों धर्म के प्रचार प्रसार में लग गये । एक इस्लाम के तो दुसरा बौद्द धर्म के प्रचार-प्रसार में । धर्म और राजनीति के आसरे देश को न समझे तो ज्यादा अच्छा है।

आतंकवाद से कश्मीर और मुसलमान को जिस तरह जो़ड़ कर देखने का माहौल बनाया जा रहा है, उस आंतक की काट आपसी रिश्तों से ही होगी । अन्यथा तथ्यों को समझिये कि देश में किसी राजनीतिक दल को 15 करोड़ वोट नही मिल पाते हैं । सबसे ज्यादा वोट भी किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल को मिलता है तो वह भी 13-14 करोड पार नहीं कर पाता । तो उसे बहुमत के पैमाने पर कैसे मापा जा सकता है। छोड़िए, मै एक और तथ्य सामने रखता हूं.....अमरनाथ मामले पर समझौता इस वक्त इसलिये हुआ क्योकि रमजान का महिना शुरु हो रहा था और इस महिने कश्मीर में खामोशी रहती है और जम्मू के लोग भी नहीं चाहते थे कि रमजान के दौर में आंदोलन-हिंसा का दौर जारी रहे ।

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